
सिगरेट से ज्यादा प्रदूषण फेफड़ों के लिए घातक है। 12 से 14 घंटे भीड़-भाड़ वाली सड़क पर रहने से हम 70 से 80 सिगरेट के बराबर धुंआ सांस के लिए जरिए भीतर लेते हैं। आमतौर पर लोग बीडी-सिगरेट 14 से 18 साल की उम्र के बाद शुरू करते हैं। नतीजतन फेफड़े की बीमारी व कैंसर की आशंका 50 साल की उम्र के बाद रहती है। वहीं प्रदूषण तो बचपन से पहले को बीमार बना रहा है। यह जानकारी केजीएमयू रेस्पीरेट्री मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. सूर्यकांत ने दी।
वह रविवार को केजीएमयू के साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में इंडियन सोसाइटी फॉर स्टडी ऑफ लंग कैंसर की 10 वीं कान्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। डॉ. सूर्यकांत ने कहा कि प्रदूषण व धूम्रपान से हर साल देश में करीब 150 नए लोग फेफड़े के कैंसर की जद में आ रहे हैं। इनमें 90 हजार मरीज दम तोड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि फेफड़े के कैंसर के मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। पुरुषों में फेफड़े का कैंसर दूसरे स्थान पर है। पहले नम्बर पर मुंह का कैंसर है।
जहर में घुल रहा जहर
सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिगम्बर बेहरा ने कहा कि बेतरतीब निर्माणकार्य व वाहनों का धुंआ पर्यावरण में जहर घोल रहा है। इसमें कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फरडाई ऑक्साइड, कार्बनडाई ऑक्साइड समेत दूसरे घातक रसायन सांस के जरिए शरीर में दाखिल हो रहे हैं। यह जहरीला धुंआ सांस की नली को संक्रमित करता है। फेफड़े में पैबस्त हो रहा है। इससे फेफड़े में कैंसर पनपता है।
40 तरह का कैंसर का कारण है बीडी-सिगरेट
बीडी-सिगरेट पीने से 40 तरह का कैंसर हो रहा है। इस पर आसानी से काबू पाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि रविवार को बीडी-सिगरेट व तम्बाकू आदि की बिक्री पर भारत सरकार को पाबंदी लगाने की जरूरत है। सोसाइटी की आम सभा में सदस्यों ने इसकी बिक्री पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने का प्रस्ताव पास किया।